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पंचम नवरात्र – स्कंदमाता माँ

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।

चतुर्थ नवरात्र – कुष्मांडा माँ

नवरात्र के चौथे दिन कुष्मांडा माँ के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘अदाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कुष्मांडा माँ के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।

जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

तृतीया नवरात्र – चंद्रघंटा माँ

नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का पूजन किया जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां के पूजन से भय का नाश अौर साहस की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में मां चंद्रघंटा का मंत्र बहुत ही कलयाणकारी माना गया है।

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। चंद्रघंटा को शांतिदायक और कल्याणकारी माना जाता है। मां का ध्यान करने से व्यक्ति को लोक और परलोक दोनों में सद्गति की प्राप्ति होती है। मां के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। माता चंद्रघंटा का शरीर स्वर्ण के समान उज्ज्वल है, इनके दस हाथ हैं। दसों हाथों में खड्ग, बाण आदि शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका वाहन सिंह है।

द्वितीय नवरात्र – ब्रह्मचारिणी माँ

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है।

प्रथम नवरात्र – शैलपुत्री माँ

देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।

चैत्र नवरात्रि – 2018

नवरात्रि हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले सबसे बड़े और महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है, जिसे पुरे भारत में  समान श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। ऐसे तो पुरे साल भर में चार नवरात्रि आती है लेकिन मुख्य रूप से केवल दो को ही बड़े पैमाने पर मनाया जाता है – 1. शरद नवरात्रि 2. चैत्र नवरात्रि

नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व देवी दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों को समर्पित है। माना जाता है जब दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर उनका राजपाठ छीन लिया था तो माता गौरी ने दुर्गा और अन्य नौ रूप धारण कर उन दैत्यों का संघार किया था। क्योंकि यह युद्ध नौ दिनों तक चला था इसीलिए इसे नवरात्रि कहा जाता है।

इन दिनों भक्त गण अपने घर माँ दुर्गा का दरबार लगाते है, कलश स्थापना करते है, पूजा आदि करते है। आठ दिनों की पूजा के बाद नौवे दिन कंजिकों को भोजन कराया जाता है जिसमे उन्हें हलवा, चना और पूरी का प्रसाद दिया जाता है। माना जाता है इस दिन घर आने वाली नौ कन्याएं देवी के नौ स्वरूपों के समान होती है और उनका सेवा सत्कार करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती है।

बहुत से लोग इन दिनों उपवास भी रखते है। कुछ पहला और आखिरी उपवास रखने का प्रण लेते है तो कुछ पुरे नौ दिनों तक अन्न का सेवन नहीं करते। बहुत से लोग पुरे नौ दिन केवल फल आदि पर ही जीवित रहते है जबकि कुछ केवल नींबू पानी पीकर अपना दिन गुजारते है। लेकिन इस विषय पर किसी पर भी कोई पाबंदी नहीं है आप जैसे चाहे वैसे उपवास रख सकते है। क्योंकि सभी के रीती रिवाज और क्षमताएं एक दुसरे से भिन्न होती है। इसीलिए आप अपनी क्षमता के अनुसार ही उपवास रखें। यहाँ हम आपको चैत्र नवरात्रि 2018 के तारीख, तिथि, वार, देवी का पूजन और उससे जुडी कुछ विशेष जानकरियां दे रहे है। जो आपको नवरात्रि पूजन में सहायता करेगी

चैत्र नवरात्रि 2018 की महत्वपूर्ण तिथियां –

नवरात्रि का दिन तारीख (वार) तिथि देवी का पूजन
नवरात्रि दिन 1 18 मार्च 2018 (रविवार) प्रतिपदा  शैलपुत्री पूजा, कलश स्थापना
नवरात्रि दिन 2 19 मार्च 2018 (सोमवार ) द्वितीया  ब्रह्मचारिणी पूजा
नवरात्रि दिन 3 20 मार्च 2018 (मंगलवार ) तृतीया  चंद्रघंटा पूजा
नवरात्रि दिन 4 21 मार्च 2018 (बुधवार ) चतुर्थी  कुष्मांडा पूजा
नवरात्रि दिन 5 22 मार्च 2018 (गुरुवार ) पंचमी स्कंदमाता पूजा
नवरात्रि दिन 6 23 मार्च 2018 (शुक्रवार ) षष्ठी  कात्यायनी पूजा
नवरात्रि दिन 7 24 मार्च 2018 (शनिवार )  सप्तमी, अष्टमी  कालरात्रि पूजा, महागौरी पूजा
नवरात्रि दिन 8 25 मार्च 2018 (रविवार)  अष्टमी, नवमी  राम नवमी
नवरात्रि दिन 9 26 मार्च 2018 (सोमवार ) दशमी नवरात्रि पारण

हैप्पी होली

भारत के सबसे मुख्य त्यौहारों में से एक है। होली रंगों का त्यौहार है जो फाल्गुन के महीने में मनाया जाता है, रंगों के इस त्यौहार पर सभी लोग एक दूसरे को रंग लगाकर प्रेम भावना को बढ़ाते हैं। होली सारे दुःख और गम भूलकर आपसी मेल मिलाप को बढ़ावा देने वाला त्यौहार है। होली के दिन सभी लोग ईर्ष्या और दुश्मनी की भावना को भूलकर सौहार्द से एक दूसरे को गले लगाते हैं।

होली का त्यौहार सबसे ज्यादा खुशियां लेके आता है. क्योंकि इस दिन हम सबसे ज्यादा हँसते झूमते और नाचते गाते हैं। लोगों के रंग से लिपे पुते चेहरे हर किसी को हंसने पर मजबूर कर देते हैं। होली का त्यौहार अब इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि केवल भारत में ही नहीं बल्कि अब ये हर देशों और विदेशों में भी मनाया जाता है.

होली का त्यौहार दो पक्षों में मनाया जाता है। पहले पक्ष में होलिका दहन होता है। होलिका दहन को मनाने के पीछे कई पौराणिक कथायें प्रचलित हैं। होलिका दहन में घरों के बाहर चौराहों पर लकड़ी, घासफूस और गोबर के उपलों को जलाते हैं। घर की महिलायें रीति गीत गाती हैं और सभी लोग एक दूसरे से गले मिलकर प्रेम प्रकट करते हैं।

दूसरे पक्ष में रंगों से होली खेली जाती है। रंग बिरंगे गुलाल, पिचकारियां और छोटे छोटे रंग भरे गुब्बारे होली की सुंदरता को बढ़ाते हैं। सभी लोग अपने सगे सम्बन्धियों के घर घर जाकर गुलाल लगाते हैं और एक दूसरे से गले मिलते हैं। नन्हें मुन्ने बच्चों के लिए ये त्यौहार बहुत ही खास होता है क्योंकि इस दिन मस्ती करने और खेलने की पूरी छूट होती है। बच्चे एक दूसरे के चेहरे पर रंग लगाते हैं। पिचकारियों में रंग भरकर एक दूसरे पर चलाते हैं। आज कल बाजारों में एक से एक अच्छे डिजाइन की पिचकारियां मिलती हैं जो बच्चों को बहुत ही आकर्षित करती हैं।

Holika Dahan

होली दो द‍िन का त्‍योहार होता है। इसमें  पहले द‍िन शाम के समय होलिका दहन मानया जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है

फाल्गुन के महीने में मनाई जाने वाली होली ना केवल रंगों का त्योहार है, बल्कि यह प्रेम के विजय का भी उत्सव है जिसमें उल्लास और उत्साह के साथ-साथ प्यार का रंग भी घुला है। होली वैसे दो द‍िन मनाई जाती है। पहले द‍िन जिसे छोटी होली भी कहा जाता है, इसके पीछे कई कहानियां भी बताई जाती हैं जिनमें से एक श‍िव कथा भी है। इस कथा के साथ ही होलिका दहन को प्रेम का त्‍योहार माना जाता है जो वासना से दूर है।

होलिका दहन के समय सभी लोग एक जगह आकर आग में आहुति देते हैं। होलिका में कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग गेहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर आदि की आहुति दी जाती है

चंद्र ग्रहण-सूतक काल-2018

चंद्र ग्रहण के कारण सूतक काल भी शुरू हो जाएगा। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करना अशुभ माना जाता है. इस साल 31 जनवरी को चंद्र ग्रहण हो रहा है। चंद्र ग्रहण के दिन देवी-देवताओं के दर्शन करना अशुभ माना जाता है। कई जगहों पर इस दिन मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। चंद्र ग्रहण के कारण सूतक काल भी शुरू हो जाएगा इस दौरान भूलकर भी कोई शुभ कार्य की शुरुआत नहीं करनी चाहिए.

मंदिरों में इस दिन कपाट बंद रहते हैं और भगवान को विश्राम गृह में भेज दिया जाता है। बुधवार को पूर्ण चंद्र ग्रहण शाम शाम 5.17 से रात्रि 8.42 तक दिखाई देगा । कहा जाता है इस दौरान प्रेंग्नेट महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों को बाहर नहीं निकलना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण को शुभ नहीं माना जाता है,

जब भी इंसान की मृत्यु होती है या कोई बच्चा जन्म लेता है तो उस घर में सूतक काल शुरू हो जाता है। इस दौरान कुछ कार्य करने की मनाही होती है। इसके साथ ही कोई भी जरूरी कार्य सूतक काल में करना अशुभ माना जाता है। बच्चे, बुजुर्गों और रोगियों के लिए सूतक काल नहीं माना जाता है। सूतक काल के दौरान भगवान की मूर्ति को स्पर्श नहीं करना चाहिए। साथ ही भोजन तथा नदी में स्नान करने से बचना चाहिए। चंद्र ग्रहण के दिन सूतक काल खत्म हो जाने के बाद पहने हुए कपड़ों सहित स्नान कर भोजन करना चाहिए।

सूतक काल में ना करें ये काम – सूतक काल के समय खाना-पीना, सोना, नाखून काटना और भोजन पकाना आदि कार्य करना अशुभ माना जाता है। इस दौरान झूठ बोलने, छल-कपट नहीं करना चाहिए।

 

Baidyanath Jyotirlinga

The Baidyanath Dham is located in Jharkhand.

The demon king- Ravana did a tremendous penance to please Lord Shiva and to get a boon from him. Even after his severe penance when Lord Shiva did not appear, he started offering his heads to Lord Shiva one by one. This way he already severed his nine heads and offered them to Shiva. When he was about to severe his last remaining head, Lord Shiva appeared before him. He blessed Ravana with unparalleled power and strength. Lord Shiva also made him a ten headed demon once again.

But Ravana was not satisfied. He requested Lord Shiva to come along with him to Lanka. Lord Shiva gave Ravana a Shivalinga and warned him against keeping it on the earth, as then no power on the earth could lift that Shivalinga from there.

Ravana proceeded with the Shivalinga. On the way he felt the urge to urinate. Ravana gave that Shivalinga to a cowherd boy and went to urinate. The cowherd boy held the Shivalinga for sometime. He felt that the Shivalinga was becoming heavier and heavier. He could not bear the weight of the Shivalinga for too long. He kept it on the ground. When Ravana returned he became very sad after seeing the Shivalinga on the ground because knew that, it was impossible to lift it from that place.

Ravana established the Shivalinga there, which became famous as ‘Baidyanath jyotirlinga’.

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